राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद अब आर्थिक स्वतंत्रता: सीएएसएमबी का ‘उद्यम विकसित मराठवाड़ा’ अभियान — पाँच वर्ष, हर दो माह में एक कार्यक्रम.
छत्रपति संभाजीनगर, १७ सितम्बर २०२६ — मराठवाड़ा को अब दूसरा मुक्ति संग्राम लड़ना होगा और वह आर्थिक होगा, ऐसा प्रतिपादन वरिष्ठ उद्योगपति राम भोगले ने मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम दिवस पर यहाँ किया। सीएएसएमबी (चेंबर फॉर एडवांसमेंट ऑफ स्मॉल एंड मीडियम बिज़नेसेस) द्वारा एमआईटी, छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित ‘उद्यम — विकसित मराठवाड़ा’ अभियान के विशेष सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में वे बोल रहे थे।

“युवावस्था में मैं मानता था कि कृषि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और उद्योग को कम। अण्णासाहेब शिंदे ने यह धारणा तोड़ दी,” भोगले ने कहा। “यदि उर्वरक, बीज, कीटनाशक और प्रसंस्करण उद्योग न बढ़े होते, तो बढ़ती जनसंख्या की थालियाँ भरना असंभव होता। कृषि को बढ़ाना है तो पहले उद्योग बढ़ना चाहिए।”
सरकारी योजनाओं के ज़मीनी क्रियान्वयन पर उन्होंने तीखी टिप्पणी की। “बजट प्रावधान बड़े हैं। परन्तु वह धन जाता कहाँ है, और क्या लाभ सचमुच ज़रूरतमंद तक पहुँचता है? सब्सिडी जेब में डाल लेना और उद्यम कभी खड़ा न करना — यही इस समाज का बड़ा दुर्भाग्य है,” उन्होंने कहा। मराठवाड़ा में कम निवेश वाली प्रसंस्करण इकाइयों की बड़ी और अब तक अप्रयुक्त संभावना उन्होंने रेखांकित की, तथा मक्का व जैव-भार से किसानों और गाँवों के लिए बिजली बनाने वाली कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) परियोजनाओं पर अपने वर्तमान कार्य की जानकारी दी।

अभियान की मूल प्रतिबद्धता घोषित करते हुए सीएएसएमबी के महासचिव डॉ. उमेश कांबळे ने कहा कि चेंबर ऐसे कार्यक्रम लगातार पाँच वर्ष तक, हर दो माह में, बिना रुके आयोजित करेगा। “आपका उद्यम शुरू करने बाहर से कोई नहीं आएगा; वह आपको ही खड़ा करना होगा,” उन्होंने कहा।
एमआईटी के महानिदेशक मुनीश शर्मा ने कहा कि कपास उत्पादन में भारत विश्व में अग्रणी है, किन्तु प्रति हेक्टेयर उपज में पड़ोसी देशों से पीछे है; सिंथेटिक वस्त्रों का स्थान जैविक रेशे ले रहे हैं, अतः नए अनुसंधान, काली मिट्टी से परे परीक्षण और मृदा गुणवत्ता में सुधार आवश्यक है। यूडीसीटी पूर्व छात्र संघ, मराठवाड़ा चैप्टर के अध्यक्ष बी. एस. खोसे ने कहा कि केवल उत्पादन से अधिक महत्वपूर्ण प्रसंस्करण और विपणन है: “जो गतिविधि पैसा न कमाए और पैसा न बचाए, उस गतिविधि का कोई अर्थ नहीं।” सेवा भारती, देवगिरि प्रांत के महेश डोंगरे ने विद्यार्थियों से पुणे-मुंबई पलायन के बजाय मराठवाड़ा में ही आजीविका खड़ी करने का आह्वान किया और बताया कि गोवर्धन योजना जैसी योजनाओं में प्रति परियोजना १० से २० करोड़ रुपये तक निधि उपलब्ध है। वीडियो संदेश में एमएसएसआरएफ की डॉ. सौम्या स्वामिनाथन ने महिला किसानों, पोषण-आधारित कृषि और मूल्यवर्धन पर बल दिया तथा ग्रामीण उद्यमी तैयार करने हेतु एमएसएसआरएफ और सीएएसएमबी की साझेदारी का स्वागत किया।

दिन भर के पाँच सत्रों में महिला किसान एवं एमएसएमई सशक्तिकरण, जलवायु परिवर्तन, जल और औद्योगिक विकास, कृषि में एआई, कार्बन बाज़ार, हल्दी व आम मूल्य शृंखला, कृषि पर्यटन, चारा क्लस्टर, खाद्य नीति व नियमन तथा निर्यात अवसरों पर मंथन हुआ — गिरे हुए मोसंबी फलों से हेस्पेरिडिन से लेकर सोयाबीन व अरहर से वनस्पति प्रोटीन तक। एपीडा ने चेताया कि यूरोपीय संघ के वन-कटाई कानून जैसे नियमों का अनुपालन अब अनिवार्य है। महाराष्ट्र सिल्क एसोसिएशन के राजेश उरकुडे ने बताया कि राज्य के ६० प्रतिशत कोकून मराठवाड़ा में बनते हैं, किन्तु प्रसंस्करण के लिए वे कर्नाटक भेजे जाते हैं। पीएमएफएमई के अंतर्गत राज्य में ज़िले के प्रथम स्थान हेतु सम्मानित ज़िला अधीक्षक कृषि अधिकारी दीपक गवळी ने बताया कि ज़िले और संभाग में महिलाओं तथा किसानों पर लगभग ११०० करोड़ रुपये व्यय हुए। समापन सत्र में क्षेत्रीय उद्यमियों और स्टार्टअप संस्थापकों का सम्मान किया गया।
यह संस्करण यूडीसीटी पूर्व छात्र संघ (मराठवाड़ा चैप्टर), सेवा भारती देवगिरि, एएफएसटीआई छत्रपति संभाजीनगर चैप्टर, एमआईटी सीएसएन, साप्ताहिक कृषि विवेक, एमएसएसआरएफ और जलसंवाद के सहयोग से आयोजित हुआ। एपीडा और इंडिया पोस्ट ‘लोकल टू ग्लोबल पार्टनर’, पीएमएफएमई सहयोगी तथा ‘मुळा चालो’ कौशल एवं उद्यमिता भागीदार रहे।

